शनिवार, 5 अगस्त 2017

आभा की कविताएं

लड़कियां
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घर-घर
खेलती हैं लडकियाँ
पतियों की सलामती के लिए
रखती हैं व्रत

दीवारों पर
रचती हैं साझी
और एक दिन
साझी की तरह लडकियाँ भी
सिरा दी जाती हैं
नदियों में

आख़िर
लडकियाँ
कब सोचना शुरू करेंगी
अपने बारे में ...।


एक शब्‍द

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शादी का
लाल जोडा पहनाया था
माँ ने

उसकी रंगत ठीक ही थी
पर उसमें टँके सितारे
उसकी रंगत
ढँक रहे थे

मुझे दिखी नहीं वहाँ
मेरी खुशियाँ
मुझ पर पहाड़-सा टूट पडा
एक शब्‍द-
शादी

बागों में सारे फूल खिल उठे
पर मेरी चुनरी की लाली
फीकी पडती गई
बक्‍से में बंद
बंद।

उस फूल का नाम
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मेरी तकदीर पर
वाहवाही
लूटते हैं लोग

पर अपने घ्रर में ही
घूमती परछाई
बनती जा रही मैं

मैं ढूंढ रही पुरानी ख़ुशी
पर मिलती हैं
तोडती लहरें
ख़ुद से सुगंध भी आती है एक

पर
उस फूल का नाम
भ्रम ही रहा
मेरे लिए।

उन आंसुओं का अर्थ
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बचपन में पराई
कहा
फिर सुहागन
अब विधवा

ओह!
किसी ने भी पुकारा नहीं
नाम लेकर

मेरे जन्‍म पर खूब रोई माँ
मैं नवजात
नहीं समझ पाई उन आँसुओं का अर्थ

क्‍या वाकई माँ
पुत्र की चाहत में रोई थी।

उद्धत भाव से
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मोहित करती है
वह तस्‍वीर
जो बसी है रग-रग में

डरती हूँ
कि छू कर उसे
मैली ना कर दूँ

हरे पत्‍तों से घिरे गुलाब की तरह
ख़ूबसूरत हो तुम
पर इसकी उम्‍मीद नहीं
कि तुम्‍हें देख सकूँ

इसलिए
उद्धत भाव से
अपनी बुद्धि मंद करना चाहती हूँ।

वक्‍तव्‍य न दो
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घृणा से
टूटे हुए लोगो!

दर्पण
और अनास्‍था से
असंतुष्‍ट महिलाओं को

वक्‍तव्‍य न दो।

जाने कौन हो तुम
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जाने कौन हो
तुम

यह
तुम्‍हारी झलक है
या कोई झील है

जिसमें
डूबी जा रही मैं।

मेरे आंसू
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कभी कभी
ऐसा क्यों लगता है
कि सबकुछ निरर्थक है

कि तमाम घरों में
दुखों के अटूट रिश्ते
पनपते हैं
जहाँ मकडी भी
अपना जाला नहीं बना पाती

ये सम्बन्ध हैं
या धोखे की टाट
अपने इर्द-गिर्द घेरा बनाए

चेहरों से डर जाती हूँ
और मन होता है
कि किसी समन्दर में छलांग लगा दूँ।

मेरी आंखों का नूर
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लोग कहते हैं
कि बेटे को
ज़िन्दगी दे दी मैंने

पर उसके कई संगी नहीं रहे
जिनकी बड़ी-बड़ी आँखें
आज भी घूरती कहती हैं-
आंटी, मैं भी कहानी लिखूंगी
अपनी

उसकी आवाज़ आज भी
गूँजती है कानों में

बच्‍ची!
कैसी आवाज़ लगाई तूने
जो आज भी गूँज रही है फिजाँ में

ओह!
व्‍हील-चेयर पर
दर्द से तड़पती आँखें वे

वह दर्द
आज मेरी आँखों का नूर बन
चमक रहा है।

बुधवार, 11 जनवरी 2017

रवि वार्ता Ravi Varta 2‌ विपिन चौधरीVipin Chaudhary

ravi varta dt dec18, 2016


अर्पण भाई के उत्साह और कर्तव्यनिष्ठा का क्या कहना। वे जहां और जब भी  होते हैं,पूरी तरह साहित्य में और साहित्य को जीते हुए ही होते हैं, पेशे से बैंकर अर्पण जी अपने व्यस्त और उबाऊ कार्यालयीन कार्यों के बीच से वक्त निकाल कर हिंदी साहित्यालोचना को भी नई धार दे रहे हैं, इसके अलावे वे कवि -कथाकार तो हैं ही।अर्पण जी से मिलते वक्त प्रायशः एक और बैंकर और मेरे अत्यंत पसंदीदा कवि आलोचक ,साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त T.S.Eliot की याद ताज़ा हो जाती है।उनका सामीप्य मेरी जयपुर पदस्थापना का हासिल है। जयपुर के शांत और स्थिर साहित्यिक परिवेश को आलोड़ित करने के उद्देश्य से हम तीनों , The Three Musketeers भाई कुमार मुकुल, अर्पण कुमार और इस खाकसार द्वारा शुरू किया गया यहअनौपचारिक साहित्यिक नुक्कड़ कार्यक्रम "रवि-वार्ता " ऐसी रफ़्तार पकड़ लेगा ,इसकी उम्मीद कम थी। खैर भाई अर्पण कुमार के अथक प्रयास और त्वरा को सलाम और शुभकामनाएं।

अनिल जी, सलाम, आपकी सादगी को। अपने विशद अध्ययन और प्रसंगानुरूप उनका उद्धरण देते हुए किसी रचना पर आपका सूक्ष्म विवेचन, कार्यक्रम की थाती होता है।
मैं वक़्त से पूछता हूँ, हम पहले क्यों नहीं मिले! वह मुस्कुरा देता है। मैं कुछ हैरान होता हूँ। वहाँ भी वही दरवेशी और हल्की उदासी से भरी मुस्कुराहट है, जो कई बार आपके मुख पर विराजमान होती है।
देर आयद, दुरुस्त आयद। इतना मन से लिखने एवं आपकी सदाशयता के लिए आपका हार्दिक आभार। हम यूँ ही रवि-वार्ता को ज़ारी रखें, यही तमन्ना है। हम सभी के व्यक्तिगत जुनून अंततः सामूहिकता में ही फलित होते हैं। यह आदान-प्रदान ही हमारा हासिल है और रवि-वार्ता का उद्देश्य भी।
 

Ravi Varta 4 vandana rag

बुधवार, 17 अगस्त 2016

सच-झूठ-ईश्‍वर - लघुकथा

दोनों नंगे ही पैदा होते हैं। तो क्‍या सच व झूठ आवरणों के नाम हैं।
पैदा होते हैं तो दोनों मर भी जाते हैं। मतलब सच-झूठ दोनों ही अमर नहीं हैं।
दोनों को जन्‍मते और मरते ईश्‍वर देखता है। तो क्‍या उसकी भूमिका दर्शक से ज्‍यादा है।
  ...... खलील जिब्रान को पढते हुए।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

जटायु - गिद्ध या चील

केरल में 100 करोड की लागत से जटायु नेचर पार्क में जो मूर्ति कलाकार ने बनायी है 70 फीट उंची वह देखने में साफ-साफ एक चील लग रही है जबकि जटायु गिद्ध था। चील की गर्दन छोटी होती है और गिद्ध की लंबी।


शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

रामराज, अतीत से मुक्‍त‍ि, पॉपुलर का महत्व, सफल व्यक्त‍ि, जिंदगी का मकसद

राम रथी विरथि लव- कूशा
देखहिं सीता भयउ कलेशा।

जो रामराज 12 साल के वनवास में सीता को गंवाने और पाने के बाद मिला और जिसमे फिर वे सीता को गंवा बैठे। जिसमे भाई लक्ष्मण को राजनिकाला के कारण सरयू मे डूबना पड़ा और उस दुख में फिर राम को भी डूबना पड़ा। जिसमे उनकी रावण जयी सेना को उनके ही बेटों के हाथ पिटना पडा और इस दुख मे सीता को खाई मे कूदना पड़ा। उस रामराज मे क्या राम दुबारा जन्म लेना चाहते ...
अतीत से मुक्‍त‍ि 
कुछ लोगों को तो पाकिस्‍तान भेज दिया जाएगा। पर राक्षस तो वे सभी हैं जो मांस-मदिरा का सेवन करते हैं। इसे राक्षसी भोजन कहा जाता है। फिर जो कुछ महान राक्षस हैं वे ब्राह्मण हैं जैसे रावण और वृत्र आदि इनकी हत्‍या के कारण राम और इन्‍द्र पर ब्रह्महत्‍या का पाप लगा था। तो इन तमाम राक्षसों के लिए क्‍यों न एक राक्षस राज्‍य बनाया जाए। सबसे बडा देवता इन्‍द्र बलात्‍कारी था पर वह राक्षस क्‍यों नहीं कहलाया। अगर हम वेद पुराण आदि को आधार बनाएंगे तो इतने झगडे हमारे आपस में निकल आएंगे कि फिर से गुलामी हमारे कदम चूमेगी। पिछला विकास का इतिहास अतीत से मुक्‍त‍ि का है। अतीत मुक्‍त अमेरिका सबसे आगे है। रूस चीन अतीत को दफना कर ही आगे बढे है। अब हमें चुनना है कि हम अतीत के नाम पर फिर से गुलामी का आह्वान करेंगे या आजादी की राह चलेंगे।

पॉपुलर का महत्व तो है ही। गुलशन नंदा , चेतन भगत से लेकर कुमार विश्वास तक, ये सब एक नया पाठक वर्ग तैयार करते हैं, हां एक समय के बाद उनकी जगह नये नये पापुलर लोग लेते जाते हैं। आज नंदा की जगह भगत हैं। जब तक आम जन में शि‍क्षा का स्तर उठता नहीं है, किताब पढने की संस्कृति, जो अब नेट पर पढने की संस्कृति में बदल रही है, विकसित नहीं होती, इन पॉपुलरों की जरूरत रहेगी।

सफल व्यक्त‍ि होता है, कुछ संदर्भों में, परिस्थ‍ितियों में, जीवन सफल या विफल नहीं होता, वह बस जीवन होता है ...अपने बहुआयामी विस्तारों के साथ ...

जिंदगी का मकसद ढूंढने की जरूरत नहीं ... 
जिंदगी जो कुछ भी  रोज ब रोज  हमारे सामने लाती है ... 
उससे दो चार होना ... उसे सही लफ्जों में बयां करना ... अपने आप में  मकसद बनता जाता है...
आप उसे बयां करने से बचने की कोशिश करें तब आपका जीवन  खुद उसे  बयां करने लगता है ...


शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

वेद पुराण उपनिषद आरण्‍यक तैत्तिरीय ब्राह्मण शंकराचार्य

ऋग्वेद - जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं-----
स्त्रिय: सतीस्तां उ मे पुंस आहु: पश्यदक्षण्वान्न बिचेतदन्ध:।
प्रकृति की रचना में प्रत्येक पुरुष के भीतर स्त्री और प्रत्येक स्त्री के भीतर पुरुष की सत्ता है। ऋग्वेद में अस्यवामीय सूक्त में कहा है—जिन्हें पुरुष कहते हैं वे वस्तुत: स्त्री हैं; जिसके आँख हैं वह इस रहस्य को देखता है; अंधा इसे नहीं समझता।

आरण्‍यक ---
अन्‍नं हि‍ भूतानां ज्‍येष्‍ठम - अन्‍न ही सभी भूतों में श्रेष्‍ठ है। अन्‍न ही बह्म है। तप यानि खेती के कर्म से ब्रह्म यानि अन्‍न को जानिए।
यजुर्वेद ---
परम चैतन्‍य की कोई प्रतिमा-मूतिै नहीं है - न तस्‍य प्रतिमा अस्ति‍।
इयमुपरि मति: - यह बुद्धि ही सर्वोपरि है।

तैत्तिरीय ब्राह्मण -----
मनुष्‍य ने ही अमृत खोजा - अजीजनन्‍नमृतं मर्त्‍यास:। 
जो दिख रहा वही सत्‍य है - चक्षुर्वे सत्‍यम।
विद्वान खुद में होम करते हैं, दूसरे यानि अग्नि में नहीं - आत्‍मन्‍येव जुह्वति, न परस्मिन।

आदिगुरु शंकराचार्य – मैं सदैव समता में स्थित हूँ-----
अहम् निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुव्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम |
सदा मे समत्वं न मुक्ति: न बंध:
चिदानंद रूप: शिवोहम शिवोहम ||6||
मैं समस्त संदेहों से परे, बिना किसी आकार वाला, सर्वगत, सर्वव्यापक, सभी इन्द्रियों को व्याप्त करके स्थित हूँ, मैं सदैव समता में स्थित हूँ, न मुझमें मुक्ति है और न बंधन, मैं चैतन्य रूप हूँ, आनंद हूँ, शिव हूँ।

ऋग्‍वेद - सोमपान पर कांड - 10, सूक्‍त - 119, मंत्र - 9,11 में रोचक बातें हैं -----
मैं पृथिवी को जहां चाहूं, उठाकर रख सकता हूं, क्‍योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं।
मेरा एक पक्ष स्‍वर्ग में स्‍थापित है तो दूसरा पृथिवी पर। क्‍योंकि मैं अनेक बार सोमपान कर चुका हूं।

ऋग्‍वेद - ----------------------
कभी दीन हीन न होने वाली पृथिवी ही स्‍वर्ग है, अंतरिक्ष है - अदितिद्योंरदितिरन्‍तरिक्षम।
भद्र स्‍त्री जनसमूह से पुरुष को मित्र के रूप में चुनती है - भद्रा वधूर्मवति यत सुपेशा:, स्‍वयं सा मित्रं वुनते जनेच‍ित।
यह मेरा हाथ ही भगवान है - अयं मे हस्‍तो भगवानयं।
हम धन के स्‍वामी हों दास नहीं - वयं स्‍याम पतयो रयीणाम।

अनेक धर्म और भाषा वाले मनुष्‍यों को धरती एक समान धारण करती है - जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणां पृथिवी यथौकसम़।
पितरों की राह पर न चल - मानु गा: पितृन।
चावल और जौ स्‍वर्ग के पुत्र हैं, अमर होने के औषध - ब्रीहिर्यवश्‍च भेषजौ दिवस्‍पुत्रावमर्त्‍यो।
मन्‍युरिन्‍द्रो - उत्‍साह ही इन्‍द्र है - अथर्ववेद।।।
मैं अन्‍न देवता ब्रम्‍ह से भी पूर्व जन्‍मा हूं - सामवेद।।।
अभय ही स्‍वर्ग है - स्‍वर्गो वै लोकोअभयम
विद्वान ही देव हैं - विद्वां सो हि देवा: - शतपथ ब्राह्मण।।।
अन्‍न ही विराट है - अन्‍नं वै विराट - एैतरेय ब्राह्मण।।।
निरे भौतिकवादी अंधकार में पहुंचते हैं, अध्‍यात्‍मवादी उससे भी गहरे अंधकार में पहुंचते हैं - इशावास्‍येनिषद।।।