कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

महिला संत ललद्यद



काश्मीर में एक प्रख्यात महिला संत हुई हैं लल्लेश्वरी। उन्‍हें ललद्यद भी पुकारा जाता है। उनकी ईश भक्ति से परेशान घर वालों ने उन्हें बाहर निकाल दिया था। भक्ति में डूबा उनका जीवन कुछ के लिए श्रद्धा का विषय था तो कुछ के लिए मजाक का। लल्लेश्वरी उपहास का बुरा नहीं मानती थीं। एक सुबह वे मंदिर जा रही थीं तो कुछ बच्चे पीछे लग गए।  एक व्यापारी से ये सब देखा नहीं देखा गया तो उसने बच्चों को फटकारा और  भगा दिया। लल्लेश्वरी ये सब देख रही थी। बच्चों के जाने पर उसने व्यापारी से कपड़ा माँगा औरउसे दो टुकड़े कर कंधों पर डाल लिया व्यापारी के साथ मंदिर को चल पडीं। राह में कोई उन्हें श्रद्धापूर्वक अभिवादन करता तो वह बाएँ कंधे पर रखे कपड़े मे एक गाँठ बाँध देतीं, कोई उनका मजाक उड़ाता तो दाएँ कपड़े में गाँठ लगा देतीं। ऐसा करते मंदिर आ गया। तब उसने व्यापारी को कहा कि देख लो कितनी गांठें हैं। व्यापारी ने हैरान रह गया, दोनों  में समान गांठें थीं। लल्लेश्वरी ने समझाया कि सच्चाई और भक्ति के मार्ग पर चलो तो प्रशंसा और निंदा को बराबर समझना। वे दिखाई तो देती हैं लेकिन उनका कोई अस्तित्व नहीं होता। इस सत्य को समझ तो मन पर इनका कोई प्रभाव नहीं होता। ललद्यद का एक लोकप्रिय पद इस प्रकार है –
गगन तू, भूतल भी
तू ही पवन और रात,
अर्घ्‍य, पुष्‍प , चंदन, पान
सब-कुछ तू, फिर चढाउं क्‍या तात ।

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