कारवॉं

नयी मंज़िल के मीरे-कारवाँ भी और होते हैं
पुराने ख़िज़्रे-रह बदले वो तर्ज़े-रहबरी बदला
-फ़िराक़ गोरखपुरी

बुधवार, 11 जनवरी 2017

ravi varta dt dec18, 2016


अर्पण भाई के उत्साह और कर्तव्यनिष्ठा का क्या कहना। वे जहां और जब भी  होते हैं,पूरी तरह साहित्य में और साहित्य को जीते हुए ही होते हैं, पेशे से बैंकर अर्पण जी अपने व्यस्त और उबाऊ कार्यालयीन कार्यों के बीच से वक्त निकाल कर हिंदी साहित्यालोचना को भी नई धार दे रहे हैं, इसके अलावे वे कवि -कथाकार तो हैं ही।अर्पण जी से मिलते वक्त प्रायशः एक और बैंकर और मेरे अत्यंत पसंदीदा कवि आलोचक ,साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त T.S.Eliot की याद ताज़ा हो जाती है।उनका सामीप्य मेरी जयपुर पदस्थापना का हासिल है। जयपुर के शांत और स्थिर साहित्यिक परिवेश को आलोड़ित करने के उद्देश्य से हम तीनों , The Three Musketeers भाई कुमार मुकुल, अर्पण कुमार और इस खाकसार द्वारा शुरू किया गया यहअनौपचारिक साहित्यिक नुक्कड़ कार्यक्रम "रवि-वार्ता " ऐसी रफ़्तार पकड़ लेगा ,इसकी उम्मीद कम थी। खैर भाई अर्पण कुमार के अथक प्रयास और त्वरा को सलाम और शुभकामनाएं।

अनिल जी, सलाम, आपकी सादगी को। अपने विशद अध्ययन और प्रसंगानुरूप उनका उद्धरण देते हुए किसी रचना पर आपका सूक्ष्म विवेचन, कार्यक्रम की थाती होता है।
मैं वक़्त से पूछता हूँ, हम पहले क्यों नहीं मिले! वह मुस्कुरा देता है। मैं कुछ हैरान होता हूँ। वहाँ भी वही दरवेशी और हल्की उदासी से भरी मुस्कुराहट है, जो कई बार आपके मुख पर विराजमान होती है।
देर आयद, दुरुस्त आयद। इतना मन से लिखने एवं आपकी सदाशयता के लिए आपका हार्दिक आभार। हम यूँ ही रवि-वार्ता को ज़ारी रखें, यही तमन्ना है। हम सभी के व्यक्तिगत जुनून अंततः सामूहिकता में ही फलित होते हैं। यह आदान-प्रदान ही हमारा हासिल है और रवि-वार्ता का उद्देश्य भी।
 

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